दर्द की घडी
कोई सूरत दिगर नही दिखती
यह खलिश दिल की क्यों नही मिटती
ठहरा है मुक़ददर में हर एक गाम पे मरना
जीने की हवस क्यों किसी सूरत नही मिटती
आती है सबा आके पलट जाती है दर से
क्या बात है जंजीरे क़फ़स क्यों नही हिलती
एक नश्तरे ग़म है के लगे जाता है पैहम
क्या बात है क्यों कर यह रगे जां नही दुखती ?
अहमद इरफान
कोई सूरत दिगर नही दिखती
यह खलिश दिल की क्यों नही मिटती
ठहरा है मुक़ददर में हर एक गाम पे मरना
जीने की हवस क्यों किसी सूरत नही मिटती
आती है सबा आके पलट जाती है दर से
क्या बात है जंजीरे क़फ़स क्यों नही हिलती
एक नश्तरे ग़म है के लगे जाता है पैहम
क्या बात है क्यों कर यह रगे जां नही दुखती ?
अहमद इरफान
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