Thursday, October 15, 2009

पेश लफ्ज़

"पेश लफ्ज़ "
अहमद इरफान

बीस बरस की हिजरत की तवील मुद्दत के बाद जब अपने वतन शहरे लखनऊ मुस्तकिल सुकूनत की ग़रज़ से वापसी हुई तो ऐसे जान्काह वाकियात हादिसात से दो चार होना पड़ा के अपने ही घर से बे अमां हो कर निकलना पड़ा, जान के लाले पड़ गए. यह सारे का सारा कलाम उन्ही दिल्सोज़ वाकियात और हवादिस पर मुश्तमिल है।

इन वाकियात ने मेरी ज़िन्दगी के रुख को मोड़ दिया.ज़िन्दगी को एक नई जहत मिली। इसी के बाद मेरे ज़हन में रौशनी के नए दरीचे खुले. मैं मशकूर ममनून हूँ अपने गिर्द पेश के उन लोगों का और खास तौर पर अपनों का जिन्हों ने मुझे ज़िन्दगी के इन तल्ख़ हकाईक से रुशनास कराया.
यह अनकही सिर्फ़ मेरी नही बल्कि आज के ज़माने में यह घर घर की कहानी है.कहीं पर परदा पड़ा हैऔर कहीं पर ज़ाहिर है .

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